महानता की कसौटी पर बाबासाहब आंबेडकर का दृष्टिकोण


किसी व्यक्ति की महानता की जो परिभाषा मैंने आंबेडकर से सीखी है। आखिर महान व्यक्ति किसे कहा जाए? वैसे अपने लेखन और भाषणों में आंबेडकर ने कई जगहों पर किस व्यक्ति को महान कहा जाए इसका विवेचन किया है, लेकिन सबसे व्यवस्थित तरीके से गांधी, रानाडे और जिन्ना शीर्षक अपने भाषण में किया है। यह भाषण उन्होंने रानाडे के व्यक्तित्व और इतिहास में उनकी भूमिका पर दिया था।


इसमें आंबेडकर साफ-साफ शब्दों में कहते हैं कि कोई व्यक्ति हो सकता है, बहुत प्रसिद्ध हो, प्रतिभाशाली हो, ज्ञानी हो, साहसी हो, त्यागी हो, बहुत बड़ा योद्धा हो, बड़ा लेखक हो, बहुत बड़ा विद्वान हो, दार्शनिक हो, विचारक हो आदि-आदि या किसी व्यक्ति में इनमें से बहुत सारे गुण एक साथ हो, लेकिन क्या इसके आधार पर किसी को महान कहा जा सकता है, आंबेडकर का उत्तर है, नहीं।


आंबेडकर महानता का सिर्फ और सिर्फ एक बुनियादी आधार मानते हैं, वह यह कि उसने अपनी प्रतिभा, विद्वता, क्षमता, साहस, ज्ञान, लेखन, दर्शन, चिंतन आदि का किसके लिए इस्तेमाल किया। यदि उसने इस सब का इस्तेमाल मानव जाति के हित के लिए, उसमें भी बहुसंख्यक शोषित-उत्पीड़ित जन के लिए, उसमें सबसे अधिक अन्याय-उत्पीड़न के शिकार लोगों के लिए किया, इतिहास की प्रगतिशील गति के लिए किया, वही व्यक्ति महान व्यक्ति कहे जाने का अधिकारी है।

अगर कोई व्यक्ति अपनी क्षमता, प्रतिभा, विद्वता, साहस, त्याग, दर्शन-चिंतन, लेखन-भाषण आदि का इस्तेमाल वर्चस्वाशाली लोगों के वर्चस्व को मजबूत करने के लिए करता है, वर्चस्व और अधीनता के संबंधों को बनाए रखने के लिए करता है, तो कत्तईं महान कहे जाने के योग्य नहीं है। उसे महान नहीं कहा जा है।

जैसे भारत में कोई व्यक्ति वर्ण-जाति व्यवस्था, वर्गीय शोषण-उत्पीड़न, पितृसत्ता, आदिवासियों पर गैर-आदिवासियों के वर्चस्व के पक्ष में खड़ा है या इस पर चुप्पी साधे है, तो वह कितना भी महान हो, विद्वान हो, साहसी हो, त्यागी हो, महान लेखक हो या कुछ और हो, वह महान नहीं है। इसी तरह वह यदि आज की तारीख में मुसलमानों के खिलाफ हिंसा और अत्याचार के खिलाफ मुंह नहीं खोलता है, तो वह महान नहीं कहा जा सकता है।


इसी लेख में आंबेडकर भारत के ब्राह्मण समुदाय का उदाहरण देते हैं, यह सामाजिक समूह अपने को सबसे प्रतिभा संपन्न, ज्ञानी, विद्वान, दार्शनिक, विचारक,लेखक मानता है, इन सब चीजों पर इसने एकाधिकार भी कायम कर रखा था, लेकिन इस समुदाय ने इसका इस्तेमाल अपने वर्चस्व को कायम रखने के लिए किया। वर्ण-जाति जैसी अन्यायपूर्ण सामाजिक-आर्थिक, सांस्कृतिक और धार्मिक संरचना को बनाए रखने के लिए किया। इसके लेखन का बड़ा हिस्सा वर्चस्व और अधीनता के संबंधो और अन्याय को कायम रखने के लिए है। 


आज भी इस समुदाय का बड़ा हिस्सा हर तरह के अन्याय के साथ खड़ा है, जबकि आंकड़ों के आधार आज भी यह सबसे अधिक शैक्षणिक योग्यता रखता है, इन्हीं के बीच के लोग सबसे अधिक विद्वान कहे जाने वाले लोग हैं, इन्हीं के बीच के सबसे अधिक लेखक हैं, पत्रकार हैं, फिल्मकार हैं, कलाकार हैं, यह समुदाय सबसे अधिक हर तरह के अन्याय का समर्थक है। यही समुदाय सबसे मजबूती के साथ मोदी-योगी की फासीवादी शासन और उनके अन्याय-अत्याचार के साथ खड़ा है।


मुक्तिबोध के शब्दों में कहें, तो सवाल यह है कि-  पार्टनर तुम्हारी पालिटिक्स क्या है?


कोई विद्वता, प्रतिभा, लेखन, साहस, त्याग, दर्शन-चिंतन, कला आदि वर्ग निरपेक्ष नहीं होती, भारत के संदर्भ में यह जोड़ना जरूरी है कि वर्ण-जाति निरपेक्ष नहीं होती।


यहां तक कोई सामाजिक विज्ञान- राजनीति शास्त्र, समाज-शास्त्र, अर्थशास्त्र आदि वर्ग-वर्ण-जाति निरपेक्ष नहीं होता।


मार्क्स ने साफ घोषणा किया है कि मार्क्सवादी विज्ञान सर्वहारा वर्ग के प्रति प्रतिबद्ध है, कोई कह पूछ विज्ञान में प्रतिबद्धता कैसी, लेकिन मार्क्स ने सर्वहारा के प्रति प्रतिबद्धता की खुली घोषणा किया है। 


आंबेडकर ने दलितों के अपनी अंतिम प्रतिबद्धता की खुली घोषणा किया है। भारत में दलितों से सर्वहारा मेहनतकश का बड़ा हिस्सा बना है।


महानता की सिर्फ और सिर्फ एक परिभाषा है, आप अपने समय के अन्यायी शक्तियों के खिलाफ हैं या नहीं। आप न्याय के संघर्षों के साथ हैं या नहीं। आप अपने समय की सबसे प्रगतिशील शक्तियों के साथ हैं या नहीं। आप अपने समय के सबसे अधिक अन्याय और उत्पीड़न के शिकार लोगों के साथ खड़े है या नहीं?


यदि ऐसा नहीं है, तो आप जाने-अनजाने अन्यायियों और उत्पीड़कों के साथ खड़े हैं, आप चाहे कितन ही विद्वान, प्रतिभाशाली, प्रभावशाली लेखक-वक्ता या प्रसिद्ध व्यक्ति क्यों न हों, आप हमसे किसी प्रकार के आदर और सम्मान की उम्मीद न रखें।

 

सिद्धार्थ रामू

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